Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 1, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
अवासनमसंकल्पं यथाप्राप्तानुवृत्तिमान् ।
शनैश्चक्रभ्रमाभोग इव स्पन्दस्व कर्मसु ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
वासनाओं ओर संकलपों से शून्य
होकर प्रारब्ध-प्राप्त कार्यों के अनुसार बर्ताव कर रहे आप चाक के ऊपर भ्रमण करनेवाले
सन्निवेश (घटादि रचना विशेष) की नाई धीरे-धीरे उत्तरोत्तर उपशमशील होते हुए अपने कर्मों
में स्पन्द करते रहिये