Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 1, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
अवेदनस्य शान्तस्य जीवतो वाप्यजीवतः ।
नेह किंचित्कृतेनार्थो नाकृतेनापि कश्चन ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
संकल्पशून्य शान्त पुरुष को जीवित रहते या न रहते इस संसार मेँ किये या न किये गये लौकिक
या वैदिक कर्मो से इस लोक या परलोक के लिए कोई भी फल नहीं होता