Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 1, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
यत्कर्माकर्म शान्तेऽन्तः शाश्वताभेदरूपिणि ।
न कर्मणि च कर्माणि न कर्तर्यपि कर्तृता ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
क्यों नहीं होता, इच शंका पर कहते हैं /
हे श्रीरामजी, चूँकि आप कर्म और अकर्म इन दोनों के बाध की अवधि हैं यानी ये दोनों आपमें
एकरूप से मिल चुके हैं, इसलिए कर्म अकर्मात्मक हुए सदा अभेदरूप आपके प्रातिभासिक कर्मरूप
से विवर्तमान होने पर भी वस्तुतः आपमें कर्मता नहीं है और प्रातिभासिक कर्तारूप से विवर्तमान
होने पर भी वस्तुतः कर्तृता नहीं है । मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि जिस मनुष्य को कर्म और
कर्तृत्व आदि में सत्यत्वबुद्धि रहती है उसीको कर्मफल मिलते हैं, सो तो आपमें है ही नहीं