Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 1, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 1, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 1 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
अहंममेति संविदन्न दुःखतो विमुच्यसे ।
असंविदन्विमुच्यसे यदीप्सितं तदाचर ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
यही कारण है कि देहादि में -अह मम“ इस तरह का ज्ञान रखनेवाले को ही विधि और निषेध
शास्त्रों के अधिकार से कर्मकृत बन्धन होता हैं, दूसरे को नहीं; यह जो पहले कहा जा बुका हैं, उसे
ही फिर कहते हैं /
हे श्रीरामजी, "अहं", "मम" (यह मैं हूँ, यह मेरा है) यह भावना कर रहे आप सांसारिक दुःखों
से छुटकारा नहीं पा सकते तथा “अहं', “मम” यह भावना न कर रहे आप मुक्ति पा सकते हैं, अतः
इनमें जो आपको अच्छा लगे वही कीजिये