Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 10, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
अजो येषां तु चिद्रूपो नास्ति मौर्ख्यविलासिनाम् ।
सर्गनाशे समुत्पन्ने किं तेषां प्र विचार्यते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह तत्वद्रष्टि से नित्यमुक्ता की सिद्धि का उपफयादन करके इसका स्वीकार न करने पर
मूर्खो में नित्यबद्धता की प्रसक्ति अनिवार्य होगी यानी मूर्ख सव नित्यकद्ध अवश्य रहेंगे, इसमें सन्देह
नहीं; यह कहते है /
अपनी मूर्खता मेँ विलास करनेवाले जिन जीवों की दृष्टि में अजन्मा चिद्रूप नहीं है उनके लिए
सृष्टि के नाश या उत्पत्ति के विषय में क्या विचार किया जाय । तात्पर्य यह है कि अनिर्मोक्ष दोष की
सत्ता बनी रहने से उनके विषय में मोक्षोपाय की चिन्ता बिलकुल व्यर्थ है