Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 10, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
यत्र यत्र परं ब्रह्म तत्र सन्ति जगन्ति हि ।
जगच्छब्दार्थरूपेण मुक्तान्येवंविधानि च ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
अर्धप्रदुद्ध पुरुषों की इष्टि से जैकी संसार की स्थिति रहती है, उसे कहते हैं /
जहाँ-जहाँ पर ब्रह्म है वहाँ-वहाँ जगत् के शब्दार्थरूप से शून्य इस तरह अनेकों जगत् हैं
ही