Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, Verse 13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 10, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

तृणे काष्ठे जले कुड्ये सर्वत्रैव परं स्थितम् । सर्वत्रैव च सर्गौघः परिप्रोतः स्थितो मिथः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

तृण, काष्ठ, जल और दीवार में सर्वत्र ही परब्रह्म स्थित है तथा सभी जगहों में सृष्टि का समूह परस्पर गुँथा हुआ स्थित है