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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 10, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

तद्वेदनावेदनयोरभेदात्स्वस्थमास्यताम् । निर्यन्त्रमेव चित्रस्थज्ञप्तिवद्व्योममध्यवत् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

(८) तात्पर्य यह है कि यदि वह जगद्रूप स्फुरित होता है, तो फिर वह चेतन ही है, चेतन से इतर नहीं है । एकमात्र जाज्य के अपलाप से ही जगद्‌ का अपलाप प्रिद्ध करके विक्षेपशून्य होकर स्थित रहो, यह कहते हैं / इसलिए हे विद्याधर, ज्ञान और अज्ञान में अभेद होने से परिच्छेदशून्य चित्रकार के चित्त में बने हुए चित्रस्थ उसके ज्ञान या गन्धर्वनगर के अधिष्ठान आकाश के मध्य के समान स्वस्थ स्थित रहो