Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 10, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 10, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 10 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मण्यशेषशक्तित्वादचित्त्वं विद्यते तथा ।
अक्षुब्धे विमले तोये भाविफेनलवो यथा ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रलयकाल में भी अचिद्गरप जगत् सूक्ष्मरृप से ब्रह्म में स्थित रहता ही है” जो श्रुति और
स्मृति मे कवन मिलते हैं वे मायाशबल के सर्वशक्ति सम्पन्न होने के कारण अम्रत्यपदार्थों में
भी ब्रह्मसत्ता की आरोप दृष्टि से ही व्यवह्ञत हुए मिलते हैं; जैसे कि भविष्य में उत्पन्न होनेवाले
जल के स्वल्य फेन में वर्तमानकाल में उपस्थित जल की चत्ता से सत्ताव्यवहार मिलता है, इसी
अभिप्राय से कहते हैं /
सम्पूर्ण शक्तियों से सम्पन्न होने के कारण ब्रह्म मे अचित्त उसी तरह रहता है, जिस तरह
अक्षुब्ध निर्मल जल में भविष्यत् फेनलव