Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
जगच्चिद्व्योमकचनमात्रमेवेति भाविते ।
तत्कथं वेदनं व्योम्ना बोधः कस्य कुतो भवेत् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि जगत् पूर्वोक््त रीति से दुःखमय ही है तथापि यह निरतिशयानन्द चिदाकाश का
स्फृरणमार ही हे यों उसकी भावना करने से उसके वास्तविक स्वरूप का दर्शन होने पर रान्ति से
कल्पित दुःखरूपता तथा उसकी दर्शन, कश्य. दर्शक आदि शरियुटी की शान्ति हो जाती हैं /
देहात्मवादी भी यदि ऐसी भावना करें. तो उनकी भी मुक्ति हो सकती है इस आशय से कहते हैं /
जगत् सच्चिदानन्दरूप ब्रह्म का स्फुरणमात्र ही है ऐसी भावना की जाय तो पहले प्रसिद्ध
दुःखादि का वेदन कैसे हो सकेगा ? भला कूटस्थ अद्वितीय चिदाकाश से कैसे किसको दुःख का
बोध होगा ? कोई द्वितीय हो और कोई दुःख का निमित्त हो तभी तो दुःख का संभव है । जब
एकमात्र आनन्द घन चिदाकाश ही है तब दुःखबोध की क्या कथा है ?