Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

न कानिचित्प्रधावन्ति एकनिश्चयसंविदाम् । पुंसां सुखानि दुःखानि रजांसि नभसामिव ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त अर्थ में (तत्र को मोह: कः शोक एकत्वमनुपश्यतः ˆ (तत्त्वज्ञानावस्था में अग्रत को देख रहे पुरुष को कोन मोह ओर थोक) इस श्रुति को अर्थतः उदाहत करते हैं । एक ब्रह्म ही है ऐसे निश्चयात्मक ज्ञानवाले पुरुषों को किन्दीं सुख या दुःखों का ऐसे ही स्पर्श नहीं होता, जैसे कि आकाश को धूलियों का स्पर्श नहीं होता