Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
सा सत्याप्यथवासत्या तया देहोऽनुभूयते ।
स्वातन्त्र्येण यथा स्वप्ने पाताले खे जले दिवि ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
वह संवित्
सत्य हो अथवा असत्य हो उसे केवल अपनी कल्पना द्वारा (पृथिवी आदि कारणों की अपेक्षा करके
नहीं) ऐसे देह का अनुभव होता है जैसे स्वप्न में, पाताल में, आकाश में, जल में ओर स्वर्ग में केवल
कल्पना से ही देह का अनुभव होता है