Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
संवित्सत्यास्त्वसत्या वा तावन्मात्रः स्मृतः पुमान् ।
स यथानिश्चयो नूनं तत्सत्यमिति निश्चयः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
संवित् चाहे सत्य हो, चाहे असत्य हो, संविद्मात्र ही
आत्मा है । उक्त संवितूमात्र आत्मा जिस प्रकार के निश्चयवाला होता है वह सत्य उसकी क्रिया
(व्यवहार क्रिया) में समर्थ होता है इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है