Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
संविच्चेदस्ति तज्ज्ञानां शरणं भवभेदने ।
नास्ति चेत्तच्छिलामूकमान्ध्यमेवावशिष्यते ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रत्यगात्मरूप संवित् ही जब तत्वतः ज्ञात होती है तब अपने कार्यभ्रूत बन्ध को दूर करती हैं,
इसलिए मुबश्च लोगें की वही शरण है / उस्रके अभाव में सारा जगत् अन्धकारपूर्ण हो जायेगा /
मोक्ष की आशा तो दुराशा ही हो जायेगी, ऐसा कहते हैं /
संवित् का यदि अस्तित्व है तो ज्ञानियों के संसारनाश में वही शरण है, यदि वह नहीं है, तो
शिला के समान जड़ अन्धकार ही अन्धकार शेष रह जाता है