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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verses 23–25

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verses 23–25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 23-25

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । दिक्ष्वधस्ताच्च नान्तोऽस्या भावी नापि जगत्क्षयः । अस्तीति भावितं येन संत्यक्ताऽभावबुद्धिना ॥ २३ ॥ विज्ञानघनमेवेदमिति नूनमपश्यता । पश्यता च यथादृष्टं सर्वक्षयमपश्यता ॥ २४ ॥ तस्य स्यात्कीदृशी ब्रह्मत्युक्तिराधिविनाशने । इति मे संशयं छिन्धि भूयो बोधाभिवृद्धये ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

कभी भी इससे विलक्षण जग्रत्‌ नहीं था यानी जगत्‌ का अभाव नहीं था ऐसा मानकर जो महाप्रलय नहीं मानते वे शाख़शून्य मुर्दे ही हैं; यों आपने पूर्व में जिनकी निन्दा की है, उनके मत के अनुसार ढ़ निश्वयवाले लोगों की तत्वज्ञान प्राप्ति में मुक्ति है या नहीं इस विषय में सन्देह कर रहे श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं / श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : ब्रह्मन्‌, इस सृष्टि का पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण आदि आठ दिशाओं में उर्ध्वं दिशा में (ऊपर) और नीचे भी अन्त नहीं है, न यह आगे उत्पन्न होनेवाली ही है और न इसका नाश ही होता है इस तरह जगत्‌ के प्राग्‌ अभाव, प्रध्वंसअभाव और अत्यन्तअभाव-इन तीनों अभावों को तिलांजलि दे चुके, यह सब विज्ञानघन ही है, यों इसे परमार्थतत्त्वरूप न देख रहे, जैसा जगत्‌ दीख रहा है, वही सत्य है यों समझ रहे और जगत्‌ का विनाश न देख रहे जिस पुरुष ने जगत्‌ की उक्तरीति से सत्यता की भावना की, उसके संसाररूपी दुःख की निवृत्ति में कैसी युक्ति है ? हे ब्रह्मन्‌, बोध की वृद्धि के लिए मेरे इस सन्देह को पुनः निवृत्त करने की कृपा कीजिये