Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
अत्रैकं तावदुचितं पूर्वमेव तथोत्तरम् ।
द्वितीयमुत्तरं न्याय्यं वक्ष्यमाणमिदं श्रृणु ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, यहाँपर एक तो पूर्वोक्त ही (शास्त्रशून्यवे
हम तत्त्वज्ञानियों की दृष्टि में मृत से ही हैं, उनके साथ वार्तालाप नहीं करना चाहिये यही) उत्तर
उचित है अथवा पहले पूर्ववादी के प्रति जो “यं यं निश्चयमादत्ते संविदन्तरखण्डितम् इत्यादि उत्तर
कहा है, वही उचित है । ऐसी परिस्थिति में चैतन्य से जब तक संवित् का सम्बन्ध नहीं होगा तब
तक तो उसका वैसा निश्चय हो सकना संभव नहीं है, अतः उसे भी थोड़ा बहुत चैतन्य का बोध
कराकर पूर्व निश्चय उसीका विवर्त है यों व्युत्पत्ति कराकर उसके अनुमान में अखण्ड आनन्दघन
उतारा जा सकता है