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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

भवेद्भागविभागात्मविनाशस्त्वविचारितः । अवश्यं तस्य भवति किलेति ननु निश्चयः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

तीसरे पक्ष में कहते हैं / अवयवघटित स्थूल शरीर को आत्मा समझनेवाले ने स्थूल देह के अवश्यम्भावी विनाश का विचार नहीं किया । जो वस्तु सावयव होती है, उसका विनाश तो किसी के रोके रोका नहीं जा सकता है-अवश्यम्भावी है । इससे वह भी स्थूल देह से अतिरिक्त आत्मा को मानता है, यह सिद्ध होता है