Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
मृतः स संविदात्मत्वाद्भूयो नो वेत्ति संसृतिम् ।
ज्ञानधौता न या संविन्न सा तिष्ठत्यसंसृतिः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
वतुर्थ पक्ष में कहते हैं /
शुद्धसंवित् को आत्मा माननेवाला जीवन्मुक्त सदा सब जगह लीला से जगत् का दर्शन करता
हुआ भी मृत्यु के बाद विदेहमात्र से कैवल्य को प्राप्त होकर फिर संसार को नहीं जानता है- नहीं
देखता है । जो संवित् तत्त्वज्ञान से शुद्ध नहीं है, वह संसार की प्राप्ति के बीज का नाश न होने से
संसार के बिना नहीं रहती, अवश्य संसार में आती है । उसका भी किसी न किसी जन्म में ज्ञान का
उदय होने से संसार से निस्तार हो जाता है