Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
अथवा नास्ति संवित्तिरिति निश्चयवान्यदि ।
ततस्तादृग्वेदनतो भवत्येव दृषज्जडः ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
छठे पक्ष में कहते हैं
अथवा यदि *संवित्ति नहीं है" इस प्रकार का निश्चयवाला (संवित् का अपलाप करनेवाला) हो
तो इस प्रकार के ज्ञान से वह चिरकाल तक पत्थर के समान जड़ होता है