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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verses 32–33

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verses 32–33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

यथावेदनमर्थेषु चित्त्वे देहक्षयात्क्षते । मृतिरेव परं श्रेयो दृष्टं नानुभवादिति ॥ ३२ ॥ असंभवाच्छुद्धविदो निःशरीरा भवन्ति ये । जडभावा जडीभूय दुर्भेदान्ध्या भवन्ति ते ॥ ३३ ॥

हिन्दी अर्थ

उसने उच्च अवस्था में क्या अथवा केसा देखा 2 इस पर कहते हैं / मरणपर्यन्त दृढीकृत अपने उक्त ज्ञान के अनुसार ही देहपात के बाद विशेष विज्ञान जब नष्ट हो गया तब गाढ़ सुषुप्ति के सदृश मृत्यु को ही (नैयायिकों के मोक्ष के तुल्य) दुःखशून्य होने से उसने परम श्रेय समझा, किन्तु निरतिशय आनन्द के अनुभव से उस मूर्ख ने श्रेय का दर्शन नहीं किया