Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 39

संस्कृत श्लोक

चिद्रूपो जीवबीजौघ आकाशकृमिजालवत् ऊर्ध्वं तिर्यगधो याति पूर्यमाण इव स्वयम् ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

ऊीक्समष्टिरूय एक हिरण्यगर्भ ही नाना जीवों के रूप से ऊपर नीचे लोको म गमन आदि द्वारा संसारी बनता है, यह कल्पना भी समुवित हैं, ऐसा कहते हैं / जैसे मटकों में भरी जा रही जलराशि ऊपर, नीचे ओर तिरछे जाती है वैसे ही चिद्रूप जीवसमष्टि हिरण्यगर्भं ही मच्छरों के समूह की तरह तिरछे, ऊपर और नीचे के लोकों मे गमन, आगमन द्वारा संसार को प्राप्त होता है