Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
चेत्यते येन कर्तान्यो बीजौघेन स तत्परः ।
तथैवानुभवत्यन्तः स्वयमेव विवल्गति ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
हिरण्यगर्भ की जो कर्तुक़प नाना जीवों की समष्टिरूपता हैं. वह भी हिरण्यग्वित् की
स्वकल्पना के आग्रहवश ही है, ऐसा प्रतिपादन करते हैं /
जो हिरण्यगर्भरूप चिदाभास बीजौघभाव से अपनी समष्टिता की भावना कर उनकी वासना
के अनुसार ही सृष्टि के आदि में बहुत प्रकार से भिन्न व्यष्टिरूप कर्ता की अपने अन्तःकरण में
भावना करता है, वह उक्त भावना में आसक्त होकर उसी भावना से नाना कर्तृरूप का अन्तःकरण
में स्वयं ही अनुभव करता है ओर जैसा अनुभव करता है वैसे ही संसार को प्राप्त होता है