Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
यथा धूमस्य नभसि यथाम्भोधौ महाम्भसः ।
आवर्तवृत्तयश्चित्रास्तथा चिद्व्योम्नि संसृतेः ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए उन जीकवेतन्यो की विचित्र-विवित्र वास्ननाओं के अनुरूप तत्-तत् सृष्टि के चेतनों
की विचित्रता से अनन्त सृष्टिवैचित्रय है, यह कहते हैं /
जैसे आकाश में धुएँ की विचित्र भ्रमियाँ (आवर्त) होती है और जैसे महासागर में जलराशि की
विचित्र भ्रमियाँ होती हैं वैसे ही सृष्टि के आरम्भ में चिदाकाश में जगत्सृष्टि की विचित्र भ्रमियाँ होती
हैं