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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 43

संस्कृत श्लोक

पुरी भवति चिद्व्योम यथा स्वप्ने नरं प्रति । तथादिसर्गात्प्रभृति तदेवेदं जगत्स्थितम् ॥ ४३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वप्न मेँ चिदाकाश ही मनुष्य के प्रति नगरी का रूप धारण करता है वैसे ही आदि सृष्टि से लेकर चिदाकाश ही जगत्‌ का रूप धारण कर स्थित है