Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
सहकारिनिमित्तानि यथा स्वप्ने न सन्ति वै ।
पृथिव्यादीनि भूतानि तथैवादौ जगत्स्थितेः ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
सहकारी कारणों के बिना ही सृष्टि के आदि में केवल प्रतिभामात्र से प्रिद्ध होने के कारण भरी
जयत् की स्वप्न समता ही है, ऐसा कहते हैं /
जैसे स्वप्न में स्वप्ननगर आदि की उत्पत्ति के लिए सहकारी कारण नहीं है वैसे ही सृष्टि
के आरम्भ में जगत्स्थिति के सहकारी कारण पृथिवी आदि महाभूत नहीं हैं