Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 49
संस्कृत श्लोक
यद्यथा वेत्ति यत्तत्सत्तथैवानुभवत्यलम् ।
यस्मात्समस्तं चिन्मात्रं किमिवात्र न विद्यते ॥ ४९ ॥
हिन्दी अर्थ
विति यदि अयनी स्ता के बल से सत् बना कर जगत् को देखती हे तव तो कुछ भी असद् नहीं
कहा जा सकता है, ऐसा कहते है /
श्रुतिप्रसिद्ध सत् वस्तु (चिति) अतः जिस-जिस वस्तु को सृष्टि के आदि में जैसा-जैसा
जानती है, उसका आज भी वैसा ही अनुभव करती है, इसलिये सारा का सारा जगत् चित्मात्र
उसमें नहीं है क्या ? जो कि वह असत्य होगा ?