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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

सर्गादौ तदृतेऽन्योऽर्थो महाप्रलयरूपिणि । अकाणरत्वान्नास्त्येव ब्रह्मैवेदमतस्ततम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

अन्य कस्तु के असभव में (सदेव सोम्येदमग्र आक्ीत्‌ (हे सोम्य. सृष्टि के पूर्व यह सद्‌ ही था) इत्यादि तियो से परिपोभित युक्ति कहते हैं / सृष्टि की पूर्वावस्था में, जबकि अद्वितीय ब्रह्मरूपी महाप्रलय का ही बोलबाला था, अद्वितीय ब्रह्म के सिवा कोई पदार्थ था ही नहीं, उसका कोई भी कारण नहीं, जिसकी कि उसके पूर्व में होने की संभावना हो । इसलिए यह ब्रह्म ही जगत्‌ के रूप से व्याप्त है