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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 100, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 100, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 100 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

समस्तवेदशास्त्रार्थं ये महाप्रलयादि च । नेच्छन्ति ते महामूढा निःशास्त्रा नो मृता इव ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कड शंका करे कि हम ब्रह्मरूपी महाप्रलय ही नहीं मानते, जैसे बीजांकुर आदि की परम्परा अनादि ह केसे ही पथिकी आदि महाभूतों का प्रवाह अनादि काल से चला आ रहा है, अतः इससे विलक्षण जगत्‌ कभी रहा ही नहीं / डस तरह के पूर्वमीमासक आदि कर्मकाण्डियों के पक्ष का खण्डन करते हैं / “सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति" (सब वेद जिस परम पद का प्रतिपादन करते हैं ), *तमेतं वेदानुवचनेन ब्रह्मणा विविदिषन्ति" (उसीको ब्राह्मण लोग वेदाध्ययन द्वारा जानने की इच्छा करते हैं ) इत्यादि श्रुतियों से सिद्ध सकल वेद और शास्त्रों के प्रतिपाद्य महाप्रलयरूपब्रह्म को, जीवों की ब्रह्मप्राप्तरूप मुक्ति को तथा मुक्ति के साधन तत्त्वज्ञान को जो नहीं मानते हैं, उनकी मूढता का क्या ठिकाना है ? मोक्षशास्त्र के अप्रामाणिक होने पर तुल्ययुक्ति से कर्म शास्त्र की अप्रमाणता का भी वारण नहीं हो सकता, अतः वे शास्त्रशून्य हैं | जब शास्त्रशून्य हो गये तो हमारी दृष्टि में वे मरे हुए से हैं अर्थात्‌ तत्त्वज्ञान के उपदेश के अयोग्य हैं