Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
चूर्णतां यान्तु मेऽङ्गानि सन्तु मेरूपमानि च ।
का क्षतिः का च वा वृद्धिश्चिद्रूपवपुषो मम ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, मेरे सारे अंग चूर्ण-चूर्ण हो जाय, या सुमेरु पर्वत के सदृश विशाल हो जाय,
इससे चिन्मात्र शरीरवाले मेरी क्या क्षति हुई ओर क्या वृद्धि हुई ?