Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्रमेवमप्युक्तं याति न क्वचिदन्यताम् ।
यस्मात्स्वयं तदेवैवमात्मानं वेत्ति नेतरत् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस तरह अनेक वादियों द्वारा अनेक प्रकार की कल्पना करने पर भी चिति के स्वरूप के विष्य
में किसी तरह क्षति नहीं होती, क्योंकि यह विति समस्त विकल्पों की साक्षी होने से स्वयं
निर्विकल्पस्वरुप है, यह कहते हैं /
इस तरह इसके स्वरूप के विषय में अनेक तरह की कल्पना होने पर भी यह चिन्मात्र
स्वरूप वाली चिति शक्ति कहीं अन्यरूपता को प्राप्त नहीं होती, क्योकि इस तरह अनेक
प्रकार से विकल्पित यह अपने आत्मा को स्वयं तद्रूप ही जानती है, अन्यरूप नहीं