Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
न जायते न म्रियते संविदाकाशमक्षयम् ।
भवेत्कथं कथय किं किलाकाशस्य संक्षयः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
(भ) जैसे अन्नादि विविध वस्तुओं का संमिश्रण ही मदरूप में परिणत हो जाता है वैसे ही
देहाकार में परिणत पृथिवी आदि महाभूतो का धर्म ही चेतन है, उससे अतिरिक्त नहीं है, यह
चार्वाक का मत है । (१) देहात्मवादी चार्वाक (२) सांख्य (३) योगी (४) शैव लोग इसे शिव,
ईश्वर, आत्मा, अणु और जीव कहते हैं ।
यह संविदाकाश अक्षय हे । न तो यह कभी जन्म लेता है ओर न कभी मरता ही है, इसमें
तनिक भी सन्देह नहीं है । हे श्रीरामचन्द्रजी, इस आकाश का नाश क्या होगा अथवा कैसे
होगा, यह कहिये