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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

यथाम्बुधिः स्वयं याति तोयाद्यावर्तकादिकम् । स्थितो दधत्तथैवेदं चिदाकाशोऽङ्गमात्मनि ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे सागर स्वयं ही अपने स्वरूपभूत जलप्रवाह, तरंग आदि में आवर्त, फेन, बुद्बुद आदि रूप अंग धारण करता रहता है वैसे ही चिदाकाश भी अपने स्वरूपम ही जगद्रूपी अंग धारण करता हुआ स्थित है