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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 19

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 19

संस्कृत श्लोक

यथा यथान्धकारेण प्रेक्ष्यमाणं प्रणश्यति । किमप्यङ्गाभ्रचक्राभं तथेदं विश्वमात्मनि ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्यों-ज्यों ज्ञान प्रबल होता जाता हैं त्यो- त्यो अज्ञानजनित यह जगत्‌ भी नष्ट होता जाता है, इसमें दष्टान्त देते हैं / जैसे अन्धकार द्वारा रात में बनाया गया कुछ एक तरह का मेघसंघात जगत का आवरण, जो रात खुलते समय दिखाई देता है, क्रमश: बिलकुल नष्ट हो जाता है यानी ज्यों ज्यों सूर्य का प्रकाश बढ़ता जाता है त्यों त्यों नष्ट होता हुआ वह कुछ देर के बाद पूर्णरूप से नष्ट हो जाता है, वैसे ही हे श्रीरामचन्द्रजी, अज्ञानरूपी अन्धकार द्वारा संपादित यह विश्व भी ज्यों-ज्यों ज्ञान बढ़ता जाता है त्यों-त्यों नष्ट होता हुआ ज्ञान का प्राबल्य होने पर अन्त में बिलकुल नष्ट होकर स्वरूप में प्राप्त हो जाता है