Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
जगद्भानं दधद्दाहं चिन्नभःस्फटिकाचलः ।
अनादिमध्यपर्यन्तः स्वच्छ आत्मनि तिष्ठति ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
चिदाकाशरूपी स्फटिक पर्वत अपने अन्दर स्वयं जगत्प्रकाश को धारण करता हुआ
स्वततत्वसाक्षात्काररूपी अग्नि से उसका दाह करके स्वच्छ आत्मस्वरूप में अवस्थित रहता हे ।
यह आदि, अन्त तथा मध्य से शून्य है (४)