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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 23

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

मृतश्चेन्न भवेद्भूयः सोऽत्राप्युपचयो महान् । भावाभावग्रहोत्सर्गज्वरः प्रशममागतः ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

पुनर्जन्म कदापि नहीं होता, यदि यही मत दुम्हारे हृदय में बेटा हुआ हैं, तो भी दुग्हें विषाद करना उवित नहीं है, क्योकि एकमात्र मृत्यु से ही सर्वविध अनर्थो का निवारण हो जाता हैं, यह कहते हैं / मृत प्राणी पुनः उत्पन्न नहीं होता, यदि यही तुम्हारा निश्चित मत है, तो इसमें भी वह महान्‌ पुरुषार्थउत्कर्ष ही है, क्योकि उत्पत्ति और नाश तथा ग्रहण और त्याग, इत्यादि सभी ज्वर एकमात्र (&) जैसे स्वच्छ स्फटिक-पर्वत अपने भीतर प्रविष्ट प्रतिबिम्बवन को पहले धारण करता हुआ कदाचित्‌ प्रतिबिम्ब अग्निभाव को प्राप्त हुए अपने ही द्वारा उस वन को जलाकर स्वरूपमात्र में अवस्थित रहता है, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिये, यह आशय है । उस मरण से ही शान्ति को प्राप्त हो गये