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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

मरणं जीवितं तस्मान्न दुःखं न सुखं यतः । नास्त्येवैतच्चिदाकाशः किलेत्थमभिजृम्भते ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार जब जन्म और मरण के रहते भी दुःख की प्राप्ति नहीं है, तो फिर इनकी अभावदशा में भला दुःख की प्राप्ति कैसे हो सकती ह /? इस आशय से उयसहार करते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, चूँकि जन्म नहीं है ओर मरण नहीं है, अतः सुख नहीं है, और दुःख भी नहीं है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है, किन्तु एकमात्र चिदाकाश ही इन सबके रूपसे स्फुरित हो रहा है