Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
मृतस्य देहलाभश्चेन्नव एव तदुत्सवः ।
मृतिर्नाशो हि देहस्य सा मृतिः परमं सुखम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
मृत प्राणी को पुनः देह का लाभ होता है या नहीं; यह सन्देह बना रहने से मृत्यु से भय
माननेवाले के ग्रति पूर्वोक््त अर्थ को ही पुनः उक्तिवैचित्रय से कहते हैं /
यदि मृत प्राणी को पुनः देह का लाभ होता है, तो यह नूतन महोत्सव ही हुआ, क्योकि बुढ़ापा
तथा नानाविध रोगों से ग्रस्त कारागृह के सदृश पूर्व शरीर का नाश ही तो मृत्यु है और वह मृत्यु परम
सुखमय है