Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
परिज्ञाते परे वस्तुन्यनादिनिधनात्मनि ।
संपद्यते वद ब्रह्मन्कीदृशः पुरुषोत्तमः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, आदि और अन्त से शून्य परम तत्त्व ब्रह्म वस्तु का भलीभाँति
ज्ञान हो जाने पर उत्तम पुरुष किन-किन लक्षणों से विशिष्ट (युक्त) हो जाता है, यह कृपा कर
किये
सर्ग सन्दर्भ
एक सी एकवाँ सर्ग समाप्त एक सौ दोवोाँ सर्ग॑ तत्त्ज्ञानी की लक्षणावलिका, जिसके दृढ़ अभ्यास से बोध दृढ़ हो जाय, पुनः वर्णन।