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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 101, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

मरणजीवितजन्मजरत्तृणान्यविमृशन्विगतेच्छमवासनः । विदितवेद्य इहाज्ञ इवोदितो वसति वीतभयस्त्वचलो यथा ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस सर्य में कही गई बातों का स्रंक्षिप्तरुप से उपसंहार करते है/ हे श्रीरामचन्द्रजी, जीवन-मरण तथा जन्म को जीर्णं तृण समझता हुआ इच्छाशून्य तथा वासना से रहित जीवन्मुक्त पुरुष विदितवेद्य होने पर भी अतिमूढ की तरह भयशून्य हो इस संसार में ऐसे निवास करता है, जैसे अचल