Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
नाभिनन्दति संप्राप्तं नाप्राप्तमभिवाञ्छति ।
आस्तेऽनुभूयमानेऽर्थे न च हर्षविषादयोः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
वह जीवन्मुक्त पुरुष सम्प्राप्त हुई वस्तु
का न तो अभिनन्दन करता है, और न अप्राप्त की अभिलाषा करता है तथा हर्ष ओर विषाद में
कारणभूत पदार्थ के अनुभूत होने पर भी वह सज्जन हर्ष तथा विषाद नहीं करता