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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

दुःखिते दुःखितकथः सुखिते सुखसंकथः । आस्ते सर्वास्ववस्थासु हृदयेनापराजितः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

किसी दुःखी प्राणी को देख लेने पर उसके साथ बैठकर उससे दुःखित कथा तथा किसी सुखसम्पन्न पुरुष के मिल जाने पर उससे सुख की कथा कहता जाता वह विवेकी महात्मा हृदय से सम्पूर्ण अवस्थाओं में सुख एवं दुःख से अभिभूत न हो सदा एक-सा स्थित रहता है