Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
नालम्बते रसिकतां न च नीरसतां क्वचित् ।
नार्थेषु विचरत्यर्थी वीतरागः सरागवत् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
वह जीवन्मुक्त महात्मा न तो किसी में आसक्ति का अवलम्बन करता है
और न कहीं विरक्ति का ही अवलम्बन करता है । वह धनों के लिए अर्थी यानी याचक होकर इधर-
उधर नहीं भटकता फिरता । वह वीतराग होकर भी रागयुक्त-सा मालूम पड़ता है