Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
यथा शास्त्रव्यवहृतेः सुखदुःखैः क्रमागतैः ।
अनागतोऽपि चायाति न हर्षं न विषादिताम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
शास्त्रानुकूल
व्यवहार से क्रमश: प्राप्त हुए सुख -दुःखों से संस्पृष्ट न होने पर भी उनका स्पर्श-सा करता है तथा
उनसे वह हर्ष या विषाद को कभी प्राप्त नहीं होता है