Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
संप्रहृष्टाश्च लक्ष्यन्ते लक्ष्यन्ते दुःखितास्तथा ।
न स्वभावं त्यजन्त्यन्तः संसारारभटीनटाः ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
चुख ओर दुःख से वह एक तरह से स्फृष्ट-सा होता है, यह जो ऊपर कहा है, उम्रका हेतु के
अवर्शन द्वारा विवरण करते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, वे महात्मा लोग सुख-दुःख के कारणों से प्रसन्नचित्त तथा दुःखित अवश्य
भासते हैं, परन्तु अपने निरतिशयआनन्दप्रतिष्ठा से उत्पन्न धैर्यपूर्ण स्वभाव का वे कभी परित्याग
नहीं करते, क्योकि वे लोग संसार रूपी नाट्यशाला के नट हैं