Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
बहिः सर्वसमाचारमन्तः सर्वार्थशीतलम् ।
नित्यमन्तरनाविष्ट आविष्ट इव तिष्ठति ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञानी पुरुष बाहर से समस्त शिष्टों के आचारों को करता हुआ भी भीतर समस्त अर्थो से शीतल
बना रहता है । वह सदा भीतर सबसे अनाविष्ट पृथक् होकर भी आविष्ट-सा स्थित रहता है