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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

वायूनिव प्रवाहस्थाः स्पृशन्ति विषयान्मुधा । देहसत्ताविषान्मूढा लीयन्ते विषयोदरे ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

परन्तु अज्ञानी लोग तत््वज्ञानियों की तरह अनामक्तिपूर्वक विषयो का भरोग करना नहीं जानते, यह कहते हैं / श्रीरामचन्द्रजी, लेकिन अज्ञानी लोग तो देहात्मसत्तारूपी विष से मूर्छित से होकर कामादि-सन्ताप की शान्तिके लिए अत्यधिक आसक्ति के कारण विषयों के उदर मेँ लीन होते हैं तथा विषयों के उदर में लीन होते हुए भी वे उन विषयों का कुछ थोड़ा सा ऐसे ही स्पर्श कर पाते हैं, जैसे कि प्रतप्त वैतरणी नदी के प्रवाह में पड़े नारकीय पुरुष ऊपर भाग से कुछ थोडा-सा व्यर्थ वायुओं का स्पर्श कर पाते हैं | (तत्वतः विषय का अनुभव करके वे विश्रान्ति को नहीं प्राप्त कर सकते, यह अभिप्राय हैं)