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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

अस्नेह एव सुघनस्नेहार्द्रहृदयो यथा । वत्सलां दर्शयन्वृत्तिं ज्ञस्तिष्ठति यथाक्रमम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

स्नेहरहित होने पर भी तत्त्वज्ञानी पुरुष सुघन स्नेह से आर्द्र हृदयवाले के समान यथायोग्य अपनी वत्सलता दर्शाता हुआ स्थित रहता है