Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
अश्ववद्ब्रह्मचर्येण चरन्तोऽचारुचेतसः ।
मिथ्यातपस्विदार्ढ्याय भवन्त्येवंविधा मुने ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुने, अश्व की तरह ब्रह्मचर्यव्रत का परिपालन करते
हुए कलुषित चित्तवाले अज्ञानी दाम्भिक पुरुष भी ज्ञानी महानुभावों की नकलकर झूठमूठ में अपनी
दृढ तपस्विता दिखलाने के लिए यानी मिथ्या परिकल्पित अपनी तपस्या की दृढ़ प्रख्याति करने के
लिए अर्थात् मुझे संसार बहुत बड़ा तपस्वी समझे, इस आशय से ऐसे होते हैं