Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
असत्यं वास्तु सत्यं वा स्वरूपं वरमीदृशम् ।
विद्धि वेदविदां त्वेष स्वभावानुभवस्थितः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने को तपस्वी बतलाने के लिए ढ़ किए गये इन लक्षणों का फल शुभ ही होता है, इसलिए
उन लक्षणों से युक्त पुरुषों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए / क्योकि वैसे पुरुषों का अनुसरण करने
पर स्वभावनिद्ध लक्षणसस्यन्न तत्त्वज्ञानी भ्री अचानक कहीं लन्ध हो जाता है, उस आशय से
श्रीकषिष्ठटकी उत्तर देते हैं
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, चाहे असत्य हो चाहे सत्य, किन्तु ऐसा स्वरूप हर
हालत में अच्छा ही है यानी दुर्लभ होने से उक्त लक्षणों से सम्पन्न स्वरूप श्रेष्ठ ही है । कहने का
तात्पर्य यह है कि उन लक्षणों से सम्पन्न पुरुष की उपेक्षा अनुचित है, चाहे भले ही वह दाम्भिक
क्यों न हो ? और जो वेदार्थतत्त्ववित् पुरुष हैं, उनमें तो ये लक्षण स्वभावअनुभव बल से ही
प्रतिष्ठित होते हैं। हठात् सम्पादित नहीं होते