Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 102, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 102, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 102 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
अनाविष्टा विचेष्टन्ते वीतरागाः सरागवत् ।
गतहासा हसन्त्यज्ञान्सहसा करुणाकुलाः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
वीतराग तथा क्रिया के फलों मे आसक्तिशून्य
भी वे जीवन्मुक्त पुरुष रागी के समान चेष्टा करते हैं, अत्यन्त दयामय वे हास रहित होते हुए भी
हास से युक्त होकर अज्ञानियों के ऊपर हँसते हैं